Home » भारत का सांस्कृतिक पुनरोद्धार काल और वैश्विक पटल पर बढ़ती स्वीकार्यता
विरासत भी, विकास भी: ‘ज्ञान भारतम्’ से लेकर 640+ धरोहरों की वापसी तक, देश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का नया अध्याय
लेखक: गजेंद्र सिंह शेखावत
(केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री, भारत सरकार)
“भारत आज विश्व को बता रहा है कि कैसे प्राचीन परंपरा और संस्कृति के साथ आधुनिकता को अपनाया जा सकता है। भविष्य में भारत का विचार, दर्शन और संस्कृति विश्व को नई दिशा देने जा रही है।”
भारत आज अर्थव्यवस्था, विज्ञान, इन्फ्रास्ट्रक्चर और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विभिन्न आयामों में तेज गति से आगे बढ़ रहा है। लेकिन भौतिक प्रगति के साथ यह भी आवश्यक है कि हम अपनी प्राचीन संस्कृति, इतिहास और विरासत को विस्मृत न करें। शताब्दियों के विदेशी आक्रमणों और शिक्षा पद्धति में बदलाव के जरिए हमारे अंतर्मन में हीन भावना उत्पन्न करने के प्रयासों के बावजूद भारत की संस्कृति जीवित रही। वर्ष 2014 से देश ने आर्थिक-सामाजिक बदलाव के साथ-साथ सांस्कृतिक पुनरोद्धार की एक बड़ी करवट ली है।
🌍 वैश्विक पटल पर बढ़ती भारतीय संस्कृति की धाक
पिछले 12 वर्षों में वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति, जीवनशैली और दर्शन की स्वीकार्यता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है:
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस: 21 जून को पूरा विश्व योग दिवस मना रहा है, जिसे दुनिया ने मानव जीवन के लिए इसकी उपयोगिता को देखकर अपनाया है।
धरोहरों की घर वापसी: वर्ष 2013 से पूर्व विदेशों से मात्र 13 प्राचीन धरोहरें भारत लाई गई थीं, जबकि पिछले 12 वर्षों में 640 से अधिक ऐतिहासिक धरोहरें देश वापस लौटी हैं।
यूनेस्को (UNESCO) की मान्यता: दुर्गा पूजा और दीपावली जैसे सामाजिक उत्सवों को यूनेस्को ने ‘विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर’ माना है। वर्तमान में भारत 44 विश्व धरोहर स्थलों के साथ दुनिया में छठे और एशिया में दूसरे स्थान पर है।
📜 ‘ज्ञान भारतम्’: 88 लाख पांडुलिपियों का डिजिटल और AI संरक्षण
विदेशी आक्रांतों द्वारा नष्ट की गई भारत की ज्ञान परंपरा की अमूल्य निधि (पांडुलिपियों) को सहेजने के लिए पहली बार युद्धस्तर पर काम हो रहा है:
राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण: देश के विभिन्न मठों, मंदिरों और संस्थानों से अब तक 88 लाख से अधिक पांडुलिपियां सूचीबद्ध की जा चुकी हैं।
हाई-टेक संरक्षण: इस प्राचीन ज्ञान को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने हेतु आधुनिकतम तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जरिए इनका डिजिटाइजेशन किया जा रहा है, जो विज्ञान, अध्यात्म, कला और शिल्प के क्षेत्र में भारतीय उत्कृष्टता को सामने लाएगा।
🏛️ सांस्कृतिक प्रतीकों का कायाकल्प और युवाओं का जुड़ाव
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहे देश के धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों का पिछले 12 वर्षों में भव्य पुनरुत्थान किया गया है:
काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल लोक कॉरिडोर (उज्जैन), केदारनाथ धाम और सोमनाथ सहित विभिन्न तीर्थ नगरियों का व्यापक विकास किया गया है।
इन स्थानों पर आधुनिक जनसुविधाएं विकसित होने से न केवल श्रद्धालुओं की राह आसान हुई है, बल्कि तीर्थस्थलों पर आने वाले युवाओं की बढ़ती संख्या भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान की गवाह बन रही है।
📈 स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना ‘आध्यात्मिक पर्यटन’
संस्कृति का यह पुनरुत्थान केवल आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के आर्थिक विकास को भी गति दे रहा है:
इन्फ्रास्ट्रक्चर और रोजगार: ऋषिकेश, अयोध्या, प्रयागराज और काशी जैसे आध्यात्मिक केंद्रों में बुनियादी ढांचे के विकास से स्थानीय आर्थिक गतिविधियां तेज हुई हैं और लोगों की जीवनशैली सुधरी है।
विदेशी सैलानियों का आकर्षण: भारतीय संस्कृति की व्यापकता को जानने और समझने के लिए रिकॉर्ड संख्या में विदेशी पर्यटक भारत आ रहे हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ पहुंच रहा है।