Home » हेमंत सरकार पर राफिया नाज़ का तीखा हमला: ‘मुर्दों के लिए बाउंड्री, पर जिंदा बच्चों के भविष्य पर ताला’
रांची:भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) झारखंड की प्रदेश प्रवक्ता राफिया नाज़ ने हेमंत सोरेन सरकार और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM)-कांग्रेस गठबंधन पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया है कि झारखंड में अल्पसंख्यक समाज के साथ सिर्फ वादों के नाम पर वोट बैंक की राजनीति की जा रही है।
राफिया नाज़ ने कहा कि कब्रिस्तान की बाउंड्री कराना गलत नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि मुर्दों की हिफाजत की चिंता करने वाली हेमंत सरकार और उनके मंत्री हाफिजुल अंसारी को जिंदा अल्पसंख्यक समाज के बच्चों और उनके भविष्य की फिक्र कब होगी? उन्होंने सवाल उठाया कि कब्रिस्तान की दीवारें तो खड़ी हो रही हैं, लेकिन उर्दू पढ़ने वाले बच्चों की अंधकारमय ज़िंदगी और उनके भविष्य के बीच खड़ी दीवारों को कौन गिराएगा?
उर्दू शिक्षक बहाली और लंबित पड़ी प्रक्रिया पर उठाए सवाल
राफिया नाज़ ने कहा कि उर्दू शिक्षकों की बहाली की लंबित प्रक्रिया वर्तमान सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। राज्य में उर्दू सहायक आचार्य के लगभग 7000 से अधिक पदों की स्वीकृति हुई थी। इतने पदों की स्वीकृति के बावजूद यदि नियुक्तियां लंबित हैं, तो इसका जवाब किसे देना चाहिए? उन्होंने कहा कि क्या अल्पसंख्यक समाज के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मांग करने का भी अधिकार नहीं है?
सरकार से इन मुद्दों पर मांगा गया जवाब
प्रेस को जारी अपने बयान में राफिया नाज़ ने निम्नलिखित मुख्य मुद्दों पर सरकार को घेरा:
मदरसा बोर्ड का गठन: मदरसा बोर्ड के गठन पर सरकार की ओर से कोई स्पष्टता नहीं है।
शिक्षकों का वेतन: जो गिने-चुने उर्दू शिक्षक कार्यरत हैं, उनकी भी तनख्वाह लंबे समय से रुकी हुई है।
अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम: निगम के पुनर्गठन और इसकी प्रभावी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।
रोज़गार और शिक्षा: युवाओं के रोजगार और शैक्षणिक संस्थानों की समस्याओं का समाधान कब होगा?
राफिया नाज़ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अल्पसंख्यक समाज को अब भाषण नहीं, परिणाम चाहिए; आश्वासन नहीं, नियुक्तियां चाहिए और घोषणाओं की जगह धरातل पर काम चाहिए।
‘अल्पसंख्यक सिर्फ चुनाव के समय का वोट बैंक नहीं’
झामुमो और कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि इन दलों को यह समझना होगा कि अल्पसंख्यक समाज केवल चुनाव के समय याद आने वाला वोट बैंक नहीं है। यदि सरकार वाकई में इस समाज की हितैषी है, तो उसे तुरंत उर्दू शिक्षक बहाली की समयसीमा घोषित करनी चाहिए, मदरसा बोर्ड के गठन पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए और अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम की स्थिति पर श्वेतपत्र जारी करना चाहिए।
उन्होंने हेमंत सोरेन सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि सत्ता में बैठकर समाज के हितैषी होने का दावा करना बेहद आसान है, लेकिन बच्चों को शिक्षा, युवाओं को रोजगार और जरूरतमंदों को आर्थिक अवसर प्रदान करना ही असली कसौटी है। सरकार को यह याद रखना चाहिए कि केवल दीवारें बनवाने से इतिहास नहीं बनता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य संवारने से इतिहास बनता है। झारखंड के अल्पसंख्यक समाज को अब जवाब चाहिए और हेमंत सरकार को इसका जवाब देना ही होगा।