Home » झारखंड के वित्त मंत्री का ‘सुरक्षा सरेंडर’ या काफिले के लिए ‘नाराज़ फूफा’ वाला दांव ?
VIP कल्चर छोड़ने की मिसाल या ‘नाराज़ फूफा’ का दांव? झारखंड के वित्त मंत्री के ‘सुरक्षा सरेंडर’ की इनसाइड स्टोरी
सत्ता के गलियारों में गाड़ियों की गिनती ही प्रतिष्ठा का पैमाना, सायरन के शोर में घुटती रांची की आम जनता।
रांची: झारखंड के सियासी गलियारों से जब यह खबर आई कि राज्य के वित्त मंत्री श्री राधाकृष्ण किशोर जी ने अपनी सुरक्षा (अंगरक्षक) वापस करने का फैसला लिया है, तो एक पल के लिए लगा कि शायद सूबे में वीआईपी (VIP) कल्चर छोड़ने की कोई अनूठी मिसाल पेश की जा रही है। आम जनता को लगा कि चलिए, देर से ही सही सत्ता के शीर्ष पर बैठे किसी नेता को जनता की तकलीफों का अहसास तो हुआ।
लेकिन… जैसे ही इस ‘त्याग’ के पीछे की असली इनसाइड स्टोरी सामने आई, जनता की उम्मीदों पर पानी फिर गया।
मामला सुरक्षा का नहीं, ‘रुतबे’ की गाड़ियों का था!
दरअसल, मामला कोई नैतिक जिम्मेदारी या सादगी अपनाने का नहीं था। अंदरखाने की खबर यह निकली कि मंत्री जी ने अपने काफिले के लिए अतिरिक्त गाड़ियों की मांग की थी। जब प्रशासन की ओर से यह मांग पूरी नहीं हुई, तो मंत्री जी ने मानों शादियों में रूठने वाले “नाराज़ फूफा” की तरह व्यवहार करते हुए अपने अंगरक्षक ही वापस कर दिए।
यानी सीधे शब्दों में कहें तो समस्या सुरक्षा की कमी नहीं थी, बल्कि गाड़ियों की कम संख्या थी। गाड़ियों की संख्या कम होने से शायद मंत्री जी का ‘रसूख’ और ‘प्रतिष्ठा’ कम हो रही थी!
सामंती मानसिकता से कब बाहर निकलेंगे माननीय?
यह घटना सिर्फ एक मंत्री की नाराजगी का मामला नहीं है, बल्कि यह झारखंड की उस गहरी सामंती मानसिकता को उजागर करती है जिससे हमारे नेता और आला अधिकारी आज भी बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। लोकतंत्र में जनता मालिक होती है, लेकिन यहां सत्ता के गलियारों में गाड़ियों की गिनती और सायरन की आवाज से ही रसूख नापा जाता है।
रांची की जनता भुगत रही है खामियाजा
एक तरफ सत्ताधीशों के लिए गाड़ियों की संख्या प्रतिष्ठा का सवाल है, तो दूसरी तरफ राजधानी रांची की आम जनता है। रांची की सड़कों पर रोज़ाना का मंज़र देखिए:
घंटों लंबे-लंबे वीआईपी काफिलों के कारण ट्रैफिक जाम।
कान फाड़ते सायरन का शोर, जिसमें एम्बुलेंस भी फंसी रह जाती हैं।
अपने ही टैक्स के पैसे से खरीदे गए वीआईपी ठाट-बाट को बेबसी से देखती जनता।
यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस राज्य को विकास, रोजगार और बुनियादी ढांचे की जरूरत है, वहां के वित्त मंत्री का ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि उनके काफिले के आगे-पीछे कितनी गाड़ियां चल रही हैं। जब तक गाड़ियों की संख्या प्रतिष्ठा का पैमाना बनी रहेगी, तब तक आम जनता इसी तरह सायरन के शोर और जाम के झाम में पिसती रहेगी।