Home » रांची खेलगांव का सच: खिलाड़ियों के सपनों पर सिस्टम का दीमक | Mega Sports Complex Ranchi Reality
रांची खेलगांव के साथ किसने किया ‘खेला’? बदहाली के आंसू रो रहा है 15 साल पुराना ‘खेलों का संसार’ !
रांची: झारखंड को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल का हब बनाने के मकसद से 15 साल पहले (साल 2011 के 34वें राष्ट्रीय खेलों के दौरान) रांची के होटवार में एक भव्य ‘खेलों की दुनिया’ बसाई गई थी। करोड़ों रुपये के बजट से बना यह ‘मेगा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स’ (Mega Sports Complex) कभी राज्य की शान हुआ करता था। लेकिन आज बदलते वक्त के साथ यह संसार उजड़ता नजर आ रहा है। ग्राउंड की चमक फीकी पड़ चुकी है और खेल की इस खूबसूरत दुनिया में उदासीनता का ‘दीमक’ लगने लगा है।
🔴 खिलाड़ियों के सपनों पर भारी पड़ता ‘उदासीन सिस्टम’
झारखंड के दूर-दराज के गांवों से आकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराने का सपना देखने वाले उभरते हुए खिलाड़ियों के अरमानों पर आज सिस्टम भारी पड़ रहा है। खेलगांव के रखरखाव (Maintenance) और संसाधनों की कमी ने इस वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर को कबाड़ में तब्दील करना शुरू कर दिया है।
हालिया अपडेट: खेलगांव की बदहाली की गूंज अब सचिवालय तक पहुंच चुकी है। हाल ही में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खेलगांव के शूटिंग रेंज और अन्य परिसरों का औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) किया। इस दौरान वहां की बेहद खराब स्थिति और अव्यवस्था को देखकर मुख्यमंत्री ने अधिकारियों के प्रति गहरी नाराजगी जताई और ट्रेनिंग व्यवस्थाओं को तत्काल दुरुस्त करने के कड़े निर्देश दिए हैं।
⚠️ आखिर कहाँ चूक गया सिस्टम? ये 4 सवाल जो हर कोई पूछ रहा है:
करोड़ों का बजट, फिर भी बदहाली क्यों? जब रखरखाव के लिए टेंडर और बजट जारी होते हैं, तो शूटिंग रेंज और स्टेडियम्स की हालत इतनी दयनीय क्यों है?
दीमक की तरह खोखली होती व्यवस्था: वर्ल्ड-क्लास मशीनें और खेल उपकरण बिना इस्तेमाल और सही देखरेख के धूल फांक रहे हैं।
खिलाड़ियों का भविष्य अधर में: जो कॉम्प्लेक्स चैंपियंस तैयार करने के लिए बना था, वहाँ बुनियादी सुविधाएं न मिलने से खिलाड़ी निराश हैं।
ट्रेनिंग का गिरता स्तर: कोच और हाई-टेक सुविधाओं के अभाव में झारखंड के युवाओं का टैलेंट दम तोड़ रहा है।
💡 अब बदलाव की उम्मीद: क्या लौटेगी खेलगांव की रौनक?
मुख्यमंत्री के कड़े रुख के बाद खेल और युवा कार्य विभाग अब हरकत में आता दिख रहा है। स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी की फाइलों को तेज करने और खिलाड़ियों का एक डिजिटल डेटाबेस बनाकर उन्हें सीधी आर्थिक मदद देने की योजना पर काम शुरू हुआ है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएगा या वाकई रांची खेलगांव के साथ हुआ ‘खेला’ बंद होगा और खिलाड़ियों को उनके सपनों की नई उड़ान मिलेगी ?