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विकास या विनाश? भनियावाला-ऋषिकेश हाईवे के लिए 3000 पेड़ों की ‘बलि’ पर भड़की जनता, याद आया ‘चिपको आंदोलन’
ऋषिकेश/देहरादून:क्या विकास की रफ्तार को नापने का पैमाना हमारे जंगलों का विनाश होना चाहिए? क्या कंक्रीट के चौड़े हाईवे हमारी आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से ज्यादा कीमती हैं? ये वो सुलगते सवाल हैं जो इस वक्त देवभूमि उत्तराखंड के ‘सात मोड़’ इलाके की हवाओं में गूंज रहे हैं। भनियावाला-ऋषिकेश फोरलेन हाईवे परियोजना (Bhaniawala-Rishikesh Highway Project) के लिए लगभग 3,000 से अधिक सदियों पुराने साल (Sal) के पेड़ों को काटे जाने के विरोध में स्थानीय नागरिकों और पर्यावरणविदों का गुस्सा फूट पड़ा है।
सड़कों पर उतरी जनता की मांग बेहद साफ और तर्कसंगत है— “हमें विकास चाहिए, लेकिन पर्यावरण की लाश पर नहीं।”
🌲 पेड़ों से लिपटकर रो पड़े लोग: जीवंत हुआ इतिहास
इस आंदोलन की सबसे भावुक कर देने वाली तस्वीरें तब सामने आईं जब महिलाएं, बुजुर्ग और युवा ‘चिपको आंदोलन’ की तर्ज पर पेड़ों से लिपट गए। कई प्रदर्शनकारियों की आँखें नम थीं; लोग मशीनों के आगे खड़े हो गए और नारा दिया— “पेड़ काटने से पहले हमें काटो”। हाल ही में स्थानीय लोगों ने काले रिबन बांधकर ‘काला हरेला’ मनाकर इस कटान के प्रति अपना गहरा दुख और विरोध दर्ज कराया है।
पर्यावरणविदों की चेतावनी: यह पूरा इलाका शिवालिक रेंज और राजाजी नेशनल पार्क के बेहद संवेदनशील ‘एलिफेंट कॉरिडोर’ (हाथियों के आवागमन का रास्ता) के अंतर्गत आता है। इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों के कटने से न केवल स्थानीय तापमान बढ़ेगा और भूजल स्तर गिरेगा, बल्कि इंसानों और जंगली हाथियों के बीच संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
🏛️ जन-आक्रोश के आगे झुकी सरकार, सीएम धामी का बड़ा फैसला
बढ़ते जन-आक्रोश और विपक्षी दलों के दबाव के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने इस प्रोजेक्ट के तहत फिलहाल पेड़ों की कटाई पर पूरी तरह से तत्काल रोक लगा दी है।
सीएम धामी ने साफ तौर पर कहा:
“हमारे लिए उत्तराखंड का पर्यावरण, जनभावनाएं और राज्य का विकास— तीनों ही बराबर महत्वपूर्ण हैं। सभी पक्षों के बीच जब तक एक संतोषजनक आम सहमति और विश्वास का माहौल नहीं बनता, तब तक पेड़ों का कटान स्थगित रहेगा। हम संवाद के जरिए ही आगे बढ़ेंगे।”
🔄 क्या है बीच का रास्ता? (Alternative Solutions)
स्थानीय लोगों और सिविल इंजीनियर्स ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) को कुछ ऐसे विकल्प सुझाए हैं जिनसे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे:
टनल या एलिवेटेड कॉरिडोर: संवेदनशील वन क्षेत्रों में जमीन पर सड़क चौड़ी करने के बजाय एलिवेटेड फ्लाईओवरों का निर्माण किया जाए ताकि नीचे का जंगल और वन्यजीव सुरक्षित रहें।
मौजूदा रूट का सुदृढ़ीकरण: अनावश्यक रूप से एक्सप्रेसवे का आकार देने के बजाय मौजूदा दो लेन की सड़क को ही आधुनिक ट्रैफिक मैनेजमेंट तकनीकों से सुधारा जाए।
वैज्ञानिक ट्रांसप्लांटेशन: जिन पेड़ों को हटाना बेहद जरूरी हो, उन्हें काटने के बजाय आधुनिक तकनीकों से वैज्ञानिक तरीके से दूसरी जगह शिफ्ट (Transplant) किया जाए, न कि उन्हें सूखने के लिए छोड़ दिया जाए।
✍️ हमारा नज़रिया: आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जवाबदेही
सरकार का संवाद के लिए कदम पीछे खींचना स्वागत योग्य है, लेकिन यह लड़ाई सिर्फ एक रोक तक सीमित नहीं है। पारदर्शिता (Transparency) और ईमानदार संवाद ही इस समस्या का एकमात्र हल है। पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों पर विचार करना आज की मजबूरी नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी है। अगर आज हम इन जंगलों को नहीं बचाएंगे, तो आने वाले कल में क्लीन एयर और पानी के संकट की जो कीमत चुकानी पड़ेगी, वो किसी भी हाईवे से मिलने वाले फायदे से लाख गुना ज्यादा होगी।