Home » झारखंड के अधिकारों पर दिल्ली का पहरा क्यों?’: खनिज संशोधन पर झामुमो का बीजेपी पर तीखा प्रहार
खनिज अधिकार झारखंड, विनोद कुमार पांडेय, जेएमबीएल सेस (JMBL Cess), आदित्य साहू बीजेपी, झामुमो बनाम बीजेपी, सुप्रीम कोर्ट खनिज टैक्स
रांची: झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने प्रेस बयान जारी कर खनिज संशोधन विधेयक और राज्यों के कर अधिकारों के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू के बयानों को भ्रम फैलाने वाला करार देते हुए कहा कि भाजपा के पास झारखंड के ज्वलंत और संवैधानिक सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं है।
“जब सवाल झारखंड के संवैधानिक अधिकार, खनिज संपदा और राजस्व का हो, तब भाजपा मुद्दे से भागती है। झारखंड की जनता जागरूक है और सब समझ रही है।”
— विनोद कुमार पांडेय, महासचिव, झामुमो
🔥 प्रमुख बिंदु (Key Highlights)
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी: जुलाई 2024 में 9 जजों की संविधान पीठ ने माना था कि खनिजयुक्त भूमि पर टैक्स लगाने का अधिकार राज्यों के पास है।
राजस्व का बड़ा नुकसान: JMBL Cess से झारखंड को 2024-25 में ₹1,379 करोड़, 2025-26 में ₹7,488 करोड़ और 2026-27 में लगभग ₹13,215 करोड़ राजस्व का अनुमान है।
‘वन नेशन, वन टैक्स’ का छलावा: झामुमो का आरोप— इस नीति की आड़ में राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को कमजोर किया जा रहा है।
संविधान पढ़ने की सलाह: आदित्य साहू संविधान की सातवीं अनुसूची और राज्यों की विधायी शक्तियों का संदर्भ समझें।
‘दिल्ली के नियंत्रण’ पर झामुमो के 5 तीखे सवाल
झामुमो महासचिव ने भाजपा नेतृत्व और झारखंड से निर्वाचित भाजपा सांसदों की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर निशाना साधा:
शर्तें क्यों थोप रही केंद्र सरकार?
यदि केंद्र का प्रस्ताव राज्यों के अधिकारों को प्रभावित नहीं करता, तो राज्य द्वारा खनिजयुक्त भूमि पर लगाए जाने वाले कर, सेस और लेवी को केंद्र की शर्तों के अधीन करने की जरूरत क्यों पड़ी?
राजस्व घाटे की भरपाई कौन करेगा?
JMBL Cess से मिलने वाले हजारों करोड़ रुपये के राजस्व से राज्य में स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास और मंईयां सम्मान योजना का संचालन होता है। अगर यह स्रोत सीमित हुआ, तो भाजपा इसकी भरपाई कैसे करेगी?
स्थानीय नुकसान की कीमत कौन चुकाएगा?
खनन से विस्थापन, पर्यावरण प्रदूषण और स्थानीय बुनियादी ढांचे पर बोझ पड़ता है। इसकी सामाजिक और सांस्कृतिक कीमत झारखंड के आदिवासी-मूलवासी चुकाते हैं, तो निर्णय का अधिकार दिल्ली के पास क्यों होना चाहिए?
मुद्दों से भटकाने की राजनीति क्यों?
छात्रों के मुद्दों या खनन नीलामी के आंकड़ों की आड़ लेकर भाजपा मूल प्रश्न—’खनिज संपदा पर अंतिम अधिकार किसका?’ से भाग रही है।
संवैधानिक संघवाद पर हमला क्यों?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यों के अधिकार स्वीकार करने के बाद संसद के कानून के जरिए उसे सीमित करना किस तरह की संघीय भावना है?
“झारखंड अपने अधिकारों पर समझौता नहीं करेगा”
विनोद कुमार पांडेय ने स्पष्ट किया कि जल-जंगल-जमीन और झारखंडियों के अधिकारों के लिए आवाज उठाना कोई “टकराव” नहीं, बल्कि संवैधानिक संघवाद की रक्षा है। यदि भाजपा के पास खनिज लूट का कोई प्रमाण है, तो उसे जांच एजेंसियों और अदालत के समक्ष रखे—केवल बयानबाजी से आरोप सिद्ध नहीं होते।
उन्होंने अंत में कहा कि झारखंड की खनिज संपदा केवल कॉर्पोरेट बैलेंस शीट का आंकड़ा नहीं है। यह लाखों परिवारों के अस्तित्व से जुड़ी है। झामुमो केंद्र के किसी भी ऐसे प्रयास का पूरी ताकत से विरोध करेगा जो राज्य की वित्तीय क्षमता और अधिकारों को कमजोर करता हो।