Home » बिहार में जहरीली शराब का तांडव: 4 और मौतें, शराबबंदी पर घिरी सरकार, विपक्ष ने बताया ‘कमाई का जरिया’
बिहार: जहरीली शराब का कहर जारी, 4 और दुखद मौतें; शराबबंदी पर मौन सरकार और मिलीभगत के गंभीर आरोप
पटना: बिहार में पूर्ण शराबबंदी का दावा एक बार फिर कागजी साबित हो रहा है। राज्य में जहरीली शराब से एक साथ 4 और लोगों की दुखद मौत का मामला सामने आया है। इस ताजा हादसे के बाद से पीड़ित परिवारों में कोहराम मचा है, वहीं प्रदेश में शराबबंदी कानून की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में जहरीली और अवैध शराब के सेवन से अब तक 1500 से अधिक बेकसूर लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु हो चुकी है। इतने बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान के बावजूद प्रशासन और सरकार की ओर से कोई ठोस या निर्णायक कदम न उठाए जाने को लेकर आम जनता और राजनीतिक हलकों में गहरा आक्रोश व्याप्त है।
कानून-व्यवस्था ध्वस्त, भ्रष्टाचार का बोलबाला
प्रदेश में लगातार हो रही इन घटनाओं ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आलोचकों और स्थानीय निवासियों का कहना है कि राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है और चहुंओर भ्रष्टाचार का साम्राज्य स्थापित हो चुका है। पुलिस प्रशासन और आबकारी विभाग की मुस्तैदी के बड़े-बड़े दावों के बीच राज्य में अवैध शराब का कारोबार धड़ल्ले से फल-फूल रहा है।
उच्चस्तरीय जांच का अभाव और मिलीभगत का आरोप
जहरीली शराब से हुई मौतों के मामलों में कभी भी कोई स्वतंत्र, निष्पक्ष या उच्चस्तरीय जांच नहीं कराई जाती। आरोप लगाए जा रहे हैं कि ऐसे हादसों के बाद मामले को दबाने की कोशिश की जाती है और केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई करके खानापूर्ति कर ली जाती है।
आरोप है कि एनडीए सरकार के मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों की शराब माफियाओं के साथ सीधी मिलीभगत है। इसी साठगांठ के कारण जहरीली शराब बनाने और बेचने वालों पर कभी सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती।
‘नेता-अधिकारी के लिए दुधारू गाय बनी शराबबंदी’
कहा जा रहा है कि बिहार में लागू शराबबंदी नीति अब आम जनता की सुरक्षा के बजाय सत्ता पक्ष के नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों के लिए ‘दुधारू गाय’ बन चुकी है। अवैध शराब की तस्करी और बिक्री से हर महीने करोड़ों रुपये का काला धन इस तंत्र में खपाया जा रहा है, जिससे शराब माफिया और भ्रष्ट तंत्र दोनों समृद्ध हो रहे हैं।
जब तक इस पूरे मामले की किसी स्वतंत्र एजेंसी या हाईकोर्ट के जज की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच नहीं होती, तब तक जहरीली शराब के इस खूनी खेल पर लगाम लगना नामुमकिन नजर आता है।