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कामाख्या मंदिर के खुले कपाट: संपन्न हुआ प्रसिद्ध ‘अंबुबाची मेला’, उमड़े 8 लाख से ज्यादा श्रद्धालु
गुवाहाटी :असम के गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ी पर स्थित विश्व प्रसिद्ध मां कामाख्या मंदिर के कपाट शुक्रवार सुबह भक्तों के लिए दोबारा खोल दिए गए। इसी के साथ पूर्वोत्तर भारत का ऐतिहासिक और सबसे बड़ा आध्यात्मिक समागम ‘अंबुबाची मेला’ संपन्न हो गया है। देवी मां के दर्शन के लिए सुबह तड़के से ही हजारों की संख्या में श्रद्धालु लंबी कतारों में अपनी बारी का इंतजार करते नजर आए।
अंबुबाची मेला: आस्था का वो अनोखा रूप जिसका कोई सानी नहीं
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस साल इस वार्षिक उत्सव में 8 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने शिरकत की।
”मां कामाख्या में अंबुबाची के पीछे जो अंतर्निहित घटना है, उसकी तुलना दुनिया में कहीं नहीं की जा सकती। यह असम की सभ्यतागत विरासत में ‘नारी शक्ति’ (Nari Shakti) की केंद्रीयता का प्रतीक है। पिछले कुछ दिनों में, 8 लाख से अधिक भक्त इस अनूठे उत्सव में शामिल हुए।”
— हिमंत बिस्वा सरमा, मुख्यमंत्री (असम)
क्यों बंद रहते हैं इस दौरान मंदिर के कपाट?
कामाख्या मंदिर का यह उत्सव बेहद खास और अनोखा माना जाता है। मान्यता है कि इस अवधि के दौरान मां कामाख्या अपने वार्षिक मासिक धर्म चक्र (Annual Menstrual Cycle) से गुजरती हैं। यही कारण है कि इस दौरान तीन दिनों के लिए मंदिर के गर्भगृह के कपाट पूरी तरह बंद रहते हैं और अंदर किसी भी तरह की पूजा-अर्चना नहीं होती।
चौथे दिन, यानी शुक्रवार सुबह, विशेष शुद्धिकरण अनुष्ठान और ‘नित्य पूजा’ के बाद मंदिर के कपाट आम जनता के लिए खोल दिए गए।

न्यूज़ हाइलाइट्स (Quick Facts):
कहाँ आयोजित हुआ: कामाख्या मंदिर, नीलाचल पहाड़ी, गुवाहाटी (असम)।
कुल श्रद्धालु: 4 दिनों में 8 लाख से ज्यादा भक्तों का आगमन।
मुख्य संदेश: मासिक धर्म को अशुद्धता नहीं, बल्कि सृष्टि की ‘उत्पादक शक्ति’ और ‘नारी शक्ति’ के रूप में मनाना।
प्रसाद: कपाट खुलने के बाद भक्तों को विशेष ‘रक्त वस्त्र’ (लाल कपड़ा) प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
भक्तों की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम
लाखों की भीड़ को देखते हुए असम प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने इस बार सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम किए थे। पहाड़ी पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए नए रास्तों का निर्माण किया गया था और पूरे परिसर में सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रखी जा रही थी। देश-विदेश से आए साधु, तांत्रिक और अघोरियों के चलते पूरा नीलाचल पर्वत इन चार दिनों तक पूरी तरह भक्ति और तंत्र साधना के रंग में डूबा रहा।
